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Saturday, July 5, 2014

तू हि सब है

तू हि सब है

मै जिस्म, तू रुह है
तू हमेशा है, मै कभी नही
तेरे होने से सब है
मेरा होना ही कुछ नही


तू थामे जो मुझको
तो जी लूँगा, ये है यकीं
गर ना मिली तू
फिर मेरी दुआ मे कुछ कमी


हर पल चाहा तुझे है
बस ये ईनायत, और कुछ मांगा नही
तेरे होने से सब है
मेरा होना ही कुछ नही


                                   -सूरज

Saturday, May 17, 2014

इंसानियत

इंसानियत



सांसें अगर है बाज़ारी तमाशा
तो हमको बिकना गवारा नहीं है
अपने अगर हैं जीने में मुसीबत
हम फिर इंसा कहलाते ही क्यों हैं


आदत हो चुकी है रौंदकर बढ़ जाना
यूँ चलने को पाँव हमें उसने बख़्शा नहीं है
डरना डराना ही दिखता है हरसू
ज़िन्दगी का फ़साना कतई ये नहीं है


फिकर की पहुँच सिक्को पे है जो ठहरी
गली के कुत्ते फिर हमसे भले हैं
तोहफों मुलाक़ातों से रुसवा मुहब्बत
तो हम फिर घर से निकलते ही क्यों हैं


आओ जीने की कोशिश करे हम
यूँ मरने को ज़िंदा कहते नहीं है
खुद को भुला कर बन जाओ सभी के
जीने का मकसद तो बस यही है
जीने का मकसद तो बस यही है...


                                                 - कुमार प्रकाश सिंह  'सूरज'




Saturday, May 19, 2012

अब तलक...



इश्क के बज़्म-ए-तरब* में ले आये हो मुझे,
अब बर्बादी पे हँसना सिखा दो ना सनम।





तू पास आ के यूँ दूर क्यों हैं,
दो कदम चलती क्यों नहीं...
तेरी जिद्द है तड़पाने की मुझको
या दूरियों से तुझे प्यार है...






दर्द के उस सफर में मै,
तेरा रास्ता था और तू मेरी मंजिल
मै अब तक हूँ बिछा पड़ा
तेरे क़दमों के निशाँ लिए हुए...





वादा-ए-वफ़ा था उसका की मुझे
उसके रहते कोई न दर्द दे पायेगा.
बड़ी मोहब्बत थी दिल में उसके,
हर एक दर्द दे अपना वादा निभाया।






तू यूँ ही दर ब दर भटकता है, 
तेरे सवाल में ही तो तेरा जवाब है
तू लाख भुला ले उसको
मगर ये बस तेरा ख़याल है|






नींद न भी आये उन्हें तो क्या,
जो जागना भूल गयें हैं,
आँखें बंद भी हो उनकी तो क्या,
जो देखना भूल गयें हैं।






दिखते हो फैयाज़* की तरह
चलते हो आलीम* की तरह
मिलते हो हमदर्द* की तरह
कहते हो वाइज़* की तरह
कभी मिल भी तो लो खुद से
ओ शहजाद-ए-तकब्बुर*
घुट घुट के मरते रहोगे
अपने ही लोगों की तरह...






अब तलक क्या खोया क्या पाया 
कब नफ्स* का जगना, कब सोना
क्या हिसाब लगाऊँ मैं इसका
बस कभी जीना हुआ, कभी मरना|

 


                                                          --कुमार प्रकाश सिंह 'सूरज'


*बज़्म-ए-तरब- Gathering of Hapiness
*फैयाज़- Munificent, Kind Hearted
*आलीम-Learned, Wise
*हमदर्द- Sympathetic 
*वाइज़- Preacher
*शहजाद-ए-तकब्बुर- Arrogance, Loftiness
*नफ्स- Soul

Wednesday, May 16, 2012

वक़्त

छाया चित्रण: कुमार प्रकाश सिंह 






ना ये बाज़ार रहेगा ना ये खरीदार रहेंगे
ये समय का किस्सा है, हर एक इसके कर्ज़दार रहेंगे...






                                                                                               --कुमार प्रकाश सिंह 'सूरज '       


Wednesday, May 9, 2012

आपके लिए


छाया चित्रण: निशिता बनर्जी


खूब जतन से तस्वीर बनायीं है बहुतो की,
मगर दिल में उतर सका न कोई
मगर आप तो हर तरफ नजर आती हैं इस कदर
की जैसे सहूलियत हो जीने में कोई।





Friday, April 27, 2012

काश!! तुझे समझा पाता...

                                                                                                  

तुझ बिन, और भी मुश्किल है ये अंगारों भरी राहें
पर साथ अगर तू होती भी, तो कौन बड़ा मै चल पाता
आँखों में तेरे खोता मैं या पैरो को तेरे सहलाता
मयखाना जब हो साथ मेरे, मंदिर-मस्जिद किसको भाता


जो बुने थे सपने हमने, जो वादे किये थे मिल के
पाना है मुझे वो कैसे भी, खुद को हूँ अब उनमे पाता
जीने को पड़ा है सारा जीवन, मान ले ओ मेरे हमदम
बस ठहर जा दो पल को पगली, मै बस इतना समझाता


चाहूँ ये मै भी, तू हो हर पल मेरे ही संग
तेरी चुडीयों को खनकाता, तेरी बातों में रम जाता
तेरी जुल्फों से खेलता, तेरी पलकों को चूमता
बस होते मैं और तुम, ये सारा जग सिमट आता


जीने देगी न ये दुनिया, यूँ ही बैठा रह जाऊं तो
अब और नहीं कर सकता देर, काश तुझे समझा पाता
और क्या मैं बतलाऊँ तुझे, तू तो ले जिद बैठी है
लगता है तुझे, जीवन बस इक पल में ही खप जाता


रूठी गुड़िया बस सुन ले इतना, तू ही है मेरा सब कुछ
होता न अगर ऐसा तो सपने न ये खुद को दिखलाता
कल हो अपना भी सुन्दर, सारी खुशियाँ हो क़दमों तेरे
बस इसलिए तेरे नैनों को आज किए हूँ नम जाता

ठहर जा दो पल को पगली, कुछ पल में ही, मैं हूँ आता...


                                                     
                                                              
                                                                      - कुमार प्रकाश सिंह 'सूरज'


Sunday, April 8, 2012

क्यों



क्यों रहता हूँ यूँ बेमतलब औरों के साथ,
बातें न कर लूं खुद से, ये हो सकता है शायद।




कैसी है उलझन, कैसी है ये बेचैनी
मन तड़पता भी है और लगता भी...




क्यों है होता परिवर्तन ऐसा, मैं, तुम, सारा जग है बदला
पर क्यों वो सूरज, न चंदा, न एक तारा है बदला,
थे वो जैसे अब तक हैं वैसे, और नित्य रहेंगे...
पर हम-तुम कल न होंगे, फिर क्यों सारा जग है बदला।




वो खिड़कियों से झांकना ही अच्छा था, इस गलियारे में आने से
वो सपनो में हँसना ही अच्छा था, इस अंधियारे में आने से।




दूसरों में डूब जो लूं , तो रास्ता मिल जाए खुद को भुलाने के लिए,
मगर यहाँ तो हर एक भागा फिर रहा है, खुद से दूर जाने के लिए।




झूम उठती थी फिजा हर एक बात पर
अब तो न वो बातें रही और न हम
सुर से बहकी कुछ इस कदर ज़िन्दगी मेरी
लौट सके न वो पल और न हम...




क्या था मैं और क्या हो गया हूँ
था मैं ऐसा या खुद को खो गया हूँ...




जिस पल चाहूँ उसको
उस पल वो रहता नहीं
जिस पल पाऊँ उसको
वो पल मेरा होता नहीं




कुछ दबा पड़ा निकल ही जाता है
लाख छुपा लो उन्हें सीने में...


                                                 - कुमार प्रकाश सिंह 'सूरज '